स्त्री झूठ बोलती है
मैं कहता जोर देकर कि
स्त्री झूठ बोलती है
अगर मैं असत्य हूँ तो कवि नहीं
केवल कविता बनाता हूँ
स्त्री के सच बोलने पर
क्या एक स्त्री माँ के रूप अनेक कष्ट नहीं सहती है?
ढोती है एक अप्रत्याशित वजन
कहने पर कहती मैं ठीक हूँ
भूखी पर कहती है भरपेट हूँ
ये झूठ नहीं है!
बहन के रूप में
जिम्मेदारियों का बोझ लादती है
और कहती है मैं सहज हूँ
नहीं होती परेशान कभी
बल्कि वह छिपाती हैं पसीने की बूँदें
पत्नी के रूप में उठाती हैं
कष्टों का पहाड़
जिसमें निकलता है पीड़ा, संवेदना और यथार्थ का निर्झर
आँखों से, भीगती खुद
पर रहती आठों याम मस्त
मुख पर नहीं कोई पस्त
हर रूप में नारी
शक्ति,भक्ति और समन्वय का नया अवतार है
रहती अस्त-व्यस्त
बोझ लादती है जीवन का
और कहती है कि मैं ठीक हूँ
छिपाती है पीड़ाओं को
क्योंकि स्त्री झूठ बोलती है
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स्त्री और कविता
एक स्त्री आजन्म उकेरती है कविता के शब्द
उसके पर्याय भिन्न-भिन्न हैं
उसकी संवेदना भिन्न-भिन्न
भिन्न-भिन्न है गढ़ने की सीमा
कविता के शब्द उकेरती है स्त्री
वे शब्द बन जाते हैं एक मजबूत हथियार
उन्ही हथियारों से लड़ती है एक युद्ध
जो है विडंबना के विरुद्ध
स्त्री और कविता दोनों संघर्ष में हैं
परिवेश के लिए
स्त्री अधिकार का संघर्ष
कविता अस्तित्व का संघर्ष
शब्दकोश में भाव एक है |
संवेदना के बहुत करीब है कविता और स्त्री
उकेरती है शब्द एक स्त्री
सहनशीलता के,
मर्यादित सापेक्षता के,
दर्द और पीड़ा के,
अप्रत्याशित रूदन के,
शौर्य गाथाओं के
जिसका इतिहास बंद है
आजकल
शब्द स्त्री को उकेरने पर विवश करतें हैं
जैसे होती है कविता
जैसे होता है आज का तथाकथित कवि
जो उकेरने की कोशिश में
रच लेता है कविता के शब्द
बाहरी-ऊपरी,
बस कविता ही कविता
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रोटी का आकार
रोटी का आकार
आदमी के आकार से भिन्न होता है
और आदमी के पेट का आकार
भूख के बराबर
भूख अपने आकार का लिहाज नहीं पाती है
बस एक प्रश्न बार-बार करती है
कि मेरा आशियाना कहाँ है?
आदमी की मौत कहाँ है?
भूख और रोटी
जैसे चाँद और सूरज
पर चाँदनी दिन-रात में आकार नहीं देखती
वह तो बस करती है इंतजार
किसी सूरज या चाँद का
हर भूख का दर्जा है
हर दर्जे का एक कर्जा है
उसी कर्जे में साँसें हैं, संवेदना है!
मर्म है और है अनिश्चित मौत!
आदमी आजन्म भूख के पीछे भागता है
भूख से संवाद भी करता है
पर भूख के साथ रोटी के आकार को महसूस नहीं करता
बस आकार-प्रकार में
खोया रहता है!
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आदमी के फलने पर
नदी ढलानों से नीचे उतरती है
पेड़ फलने पर झुक जाता है
झरने गिरने को आतुर हैं
बस इंतजार बारिश का रहता है
यह गुरूत्वाकर्षण का नियम नहीं है
यह परोपकारी समर्पण है
मुझे बहुत अजीब-सा लगा
कि गिरना-झुकना और उतरना
कितना भिन्न है
क्योंकि मानव का गिरना
किसी परिभाषा से तालमेल नहीं है
नदी, पेड़ और झरने
ब्रह्माण्ड की तह तक देखना चाहते हैं
जीवन की तलाश
ताकि जिंदा रह सकें
मानवी सभ्यताएँ
नदी को आदमी ने
मरने को मजबूर किया
पेड़ को आदमी ने
नेस्तनाबूद करने की प्रतिस्पर्धा में हिस्सेदारी की
और झरने के संगीत को बदल दिया
मर्सिया-गान में
नदी का उतरना अखरता है आदमी को
पेड़ का झुकना सालता है उसे
झरने का रोमांच उसे रुलाता है
आदमी फलने पर
अकड़ जाता है
लग जाती है अहंकार की दीमक
जो धीरे-धीरे
झुकना सिखाती है
पेड़, नदी और झरने के बीच
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नदी की हत्या
कितनी रफ्तार थी उस नदी की
ये जानती है खेत पर बनी मेड़
कितना उत्साह था उस नदी का
ये महसूस करता है एक बीज
कितना लंबा रास्ता था उस नदी का
यह जानते हैं जुड़ते-टूटते विकासशील शहर
नदी चलती है तोड़ने के लिए
उन सीमाओं को
जो बना रखी है इंसानों ने निश्चित परिधि में
नदी खींचती है उन रेखाओं को
जो रेखाएँ दहाड़ती हैं करने को नेस्तनाबूद इंसानियत
जहाँ से प्रारंभ है नदी का
वहाँ से ही बनाती चलतीं है सभ्यताएँ
ये सभ्यताएँ सृष्टि के प्रारंभ से
नदियों से संवाद करती आई हैं
नदियों ने हमेशा
अपनी उम्र का हिस्सा लगा दिया
मानवता स्थापित करने में
नदियों ने ढोया एक झूठ को
जो सच बनने के लिए
समुद्र को लांघने की प्रतिस्पर्धा में है
नदियों ने बनाए धर्म और संस्कृति
नदियों ने किया पवित्र मानव
नदियों ने हमेशा राष्ट्र धरम को अपनाया
और हमने कर दी उनकी हत्या
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